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नर्मदा की सुरक्षा पर हाई अलर्ट, NGT ने मध्य प्रदेश सरकार को भेजा नोटिस

भोपाल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की भोपाल बेंच ने पर्यावरण के प्रधान सचिव को नर्मदा नदी को साफ रखने के लिए दिए गए निर्देशों पर एक अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। यह रिपोर्ट विभिन्न एजेंसियों, विभागों, जिला कलेक्टरों और नगर निगम आयुक्तों से संकलित की जाएगी। NGT ने यह निर्देश एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। नर्मदा को जीवन रेखा बनाए रखने के लिए निर्देश NGT ने नर्मदा नदी के बाढ़ क्षेत्र को चिह्नित करने, उस क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने, नदी में बिना उपचारित सीवेज और ठोस कचरा बहाने पर रोक लगाने, अवैध रेत खनन बंद करने और पूरे साल नदी के प्रवाह को स्थिर रखने जैसे कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। ये निर्देश नर्मदा नदी को मध्य प्रदेश की जीवन रेखा बनाए रखने के लिए हैं। रिपोर्ट के आधार पर होगी कार्रवाई यह अनुपालन रिपोर्ट 1 सितंबर, 2025 को NGT द्वारा जारी आदेश के अनुसार तैयार की जानी है। यह रिपोर्ट याचिकाकर्ता कीर्ति कुमार सदाशिव भट्ट की याचिका पर आधारित है। रिपोर्ट को NGT के रजिस्ट्रार को सौंपा जाएगा, जो इसे ट्रिब्यूनल के सामने पेश करेंगे। इसके बाद, रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। निष्पादन याचिका पर सुनवाई NGT ने यह टिप्पणी जबलपुर की सामाजिक कार्यकर्ता पी.जी. नज्पांडे द्वारा दायर एक निष्पादन याचिका पर सुनवाई करते हुए की। NGT यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके द्वारा जारी किए गए निर्देशों का ठीक से पालन हो रहा है या नहीं। इसी के लिए NGT ने अब मुख्य सचिव (पर्यावरण) को इस मामले में निर्देशित किया है।  

उज्जैन के सप्त सागरों की स्थिति पर एनजीटी का सख्त रुख, पर्यावरणीय संकट को लेकर उठाई आवाज

उज्जैन उज्जैन की धार्मिक, ऐतिहासिक और पर्यावरणीय पहचान माने जाने वाले ‘सप्त सागर’ लगातार उपेक्षा, अतिक्रमण और प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। इस गंभीर स्थिति पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाते हुए मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव को सीधे दखल देने को कहा है। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा है कि आदेशों की अवहेलना और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सेंट्रल जोन बेंच के न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह और एक्सपर्ट मेंबर सुधीर कुमार चतुर्वेदी ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि स्थानीय प्रशासन न तो पूर्व आदेशों का समुचित पालन कर पाया और न ही समय पर संतोषजनक प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण जैसे संवेदनशील मामलों में प्रशासनिक शिथिलता गंभीर परिणाम ला सकती है। अतिक्रमण हटाने की दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई सुनवाई में सामने आया कि खसरा नंबर 1281 में दर्ज गोवर्धन सागर (कुल रकबा 36 बीघा) के 18.5 बीघा से अधिक हिस्से पर अवैध कब्जा हो चुका है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस भूमि पर किसी भी न्यायालय का कोई स्टे नहीं है, इसके बावजूद अतिक्रमण हटाने की दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। आगामी सिंहस्थ 2028 को ध्यान में रखते हुए एनजीटी ने शासन-प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि सप्तसागर के संरक्षण और पुनर्जीवन का कार्य मिशन मोड में किया जाए। ट्रिब्यूनल ने प्रमुख सचिव (पर्यावरण) को मासिक निगरानी कर रिपोर्ट पेश करने और मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सभी सात सागरों के पानी की गुणवत्ता की जांच कर हेल्थ रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं। पवित्र सरोवर बने नालियां आवेदक प्रशांत मौर्य और बाकिर अली रंगवाला की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने माना कि उज्जैन के रुद्रसागर, पुष्कर सागर, क्षीरसागर, गोवर्धन सागर, रत्नाकर सागर, विष्णु सागर और पुरुषोत्तम सागर, सभी की हालत दयनीय हो चुकी है। उज्जैन मास्टर प्लान-2021 के संदर्भ में ट्रिब्यूनल ने गंभीर टिप्पणियां करते हुए कहा कि तालाबों को कचरा डंपिंग यार्ड में तब्दील कर दिया गया है। शहर का अनुपचारित सीवेज सीधे इन जल निकायों में प्रवाहित हो रहा है। अवैध निर्माणों और गंदे पानी के कारण जल गुणवत्ता बेहद खराब हो चुकी है, जिससे स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं। जारी रहेगी सुनवाई एनजीटी ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई 20 फरवरी 2026 को होगी, जिसमें कलेक्टर और नगर निगम को की गई कार्रवाई की विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। अगली सुनवाई में प्रशासन को यह बताना होगा कि जमीनी स्तर पर आखिर क्या बदला। संकेत साफ है कि महाकाल की नगरी में आस्था के साथ अब पर्यावरणीय जवाबदेही भी कसौटी पर है। एनजीटी ने गेंद पूरी तरह शासन-प्रशासन के पाले में डाल दी है। एनजीटी के मुख्य निर्देश ये     अतिक्रमण हटाना : खसरा नंबर 1281 (गोवर्धन सागर) सहित सभी सातों सागरों से तत्काल और पूर्ण अतिक्रमण हटाने के निर्देश।     सीवेज पर पूर्ण रोक : बिना उपचारित (अनट्रीटेड) गंदा पानी और सीवेज किसी भी जल निकाय में बहाने पर पूरी तरह रोक।     मुख्य सचिव की सीधी भूमिका : राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश कि वे स्वयं हस्तक्षेप कर कलेक्टर और नगर निगम से प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित कराएं।     मासिक निगरानी तंत्र : प्रमुख सचिव (पर्यावरण) हर महीने प्रगति की निगरानी कर रिपोर्ट ट्रिब्यूनल में पेश करेंगे।     जल गुणवत्ता की जांच : मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सभी सात सागरों के पानी के नमूने लेकर हेल्थ रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश।     अनुपालन रिपोर्ट अनिवार्य : कलेक्टर और नगर निगम को 20 फरवरी 2026 की अगली सुनवाई से पहले की गई कार्रवाई की विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।